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अमेरिका एच-1बी वीजा कार्यक्रम
America H-1B Visa Program: अमेरिका में एच-1बी वीजा कार्यक्रम को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। रिपब्लिकन पार्टी के अंदर ही इस पूरे मामले पर मतभेद देखने को मिल रहा है। अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस मामले में अपनी पुरानी नीतियों से अलग रुख अपनाते हुए इसे ‘शानदार कार्यक्रम’ कहा है। एच-1बी वीजा कार्यक्रम को लेकर चल रही बहस में विवेक रामास्वामी, निक्की हेली और अरबपति करोबारी एलन मस्क की कूद पड़े हैं। इस वीजा को लेकर ऐसे लोगों में नाराजगी भी देखने को मिल रही है जो ट्रंप प्रशासन के ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे के समर्थन में हैं। तो चलिए ऐसे में जानते हैं कि आखिर एच-1बी वीजा कार्यक्रम है क्या और खासकर भारतीयों पर इसका क्या असर पड़ेगा।
एच-1बी वीजा धारकों का अमेरिका में योगदान
एच-1बी वीजा को लेकर विस्तार से बात करें उससे पहले यह जान लें कि एच-1बी वीजा धारकों ने अमेरिका में किस तरह से योगदान दिया है। अमेरिका का तकनीकी क्षेत्र कर्मचारियों की कमी को पूरा करने के लिए एच-1बी कार्यक्रम पर काफी निर्भर है। अध्ययनों से पता चलता है कि एच-1बी वीजा धारकों ने अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2021 में एच-1बी कर्मचारियों का औसत वेतन 108,000 डॉलर था, जबकि कुल मिलाकर अमेरिकी कर्मचारियों के लिए यह 45,760 डॉलर था। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के दौरान टीके के विकास जैसे क्षेत्रों में एच-1बी कर्मचारियों की अहम भूमिका रही है।
एच-1बी वीजा है क्या?
एच-1बी वीजा एक अस्थायी वीजा है जो संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) उन विदेशी नागरिकों को जारी करता है जो विशेष व्यवसायों में काम करने के लिए आना चाहते हैं। विशेष व्यवसायों में आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, अकादमिक अनुसंधान और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले काम शामिल हैं। इस वीजा की अवधि आमतौर पर तीन साल की होती है, जिसे छह साल तक बढ़ाया जा सकता है। यह ग्रीन कार्ड के माध्यम से स्थायी निवास प्राप्त करने का रास्ता भी खोल सकता है। इस कार्यक्रम के लिए प्रतिवर्ष 65,000 वीजा की सीमा है।
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अमेरिका एच-1बी वीजा कार्यक्रम
भारतीयों पर एच-1बी वीजा का प्रभाव
भारत से बड़ी संख्या में आईटी और तकनीकी क्षेत्र के पेशेवर एच-1बी वीजा के तहत अमेरिका में काम करने जाते हैं। एच-1बी वीजा के बदलावों का भारतीय पेशेवरों और कंपनियों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
आर्थिक प्रभाव: भारतीय आईटी कंपनियां और पेशेवर एच-1बी वीजा पर बहुत अधिक निर्भर हैं। वीजा संबंधी किसी भी सख्ती का मतलब है कि भारतीय कंपनियों को अपने व्यापार मॉडल को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे उनके राजस्व पर प्रभाव पड़ सकता है।
कॉम्पिटिटिवनेस: भारतीय पेशेवरों को एच-1बी वीजा पर काम करने का मौका मिलता है, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय अनुभव और नई तकनीकों की जानकारी मिलती है। यह भारतीय आईटी उद्योग की कॉम्पिटिटिवनेस को बढ़ाता है।
आव्रजन नीति: अमेरिका में आव्रजन नीति में बदलाव एच-1बी वीजा की संख्या और प्रक्रिया पर प्रभाव डाल सकते हैं। वीजा की संख्या सीमित होने से भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने के अवसर कम हो सकते हैं।
एच-1बी वीजा के बारे में यह भी जानें
विशेष योग्यता: आवेदक के पास विशेष व्यवसाय से संबंधित क्षेत्र में न्यूनतम स्नातक (बैचलर) डिग्री होनी चाहिए।
एम्प्लॉयर द्वारा स्पॉन्सरशिप: एच-1बी वीजा के लिए आवेदन करने के लिए एक अमेरिकी नियोक्ता (एम्प्लॉयर) द्वारा स्पॉन्सरशिप आवश्यक है। नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि वो अमेरिकी कामगारों को नौकरी देने के प्रयास के बाद ही विदेशी कर्मचारी को नौकरी दे रहे हैं।
लेबर सर्टिफिकेशन: एम्प्लॉयर को यह भी प्रमाणित करना होता है कि विदेशी कर्मचारी को दिया जाने वाला वेतन अमेरिकी मानकों के अनुसार है।
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भारत को रखना होगा ध्यान
एच-1बी वीजा भारतीय पेशेवरों और कंपनियों के लिए अमेरिका में काम करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें होने वाले किसी भी परिवर्तन का व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव हो सकता है। इसलिए, भारतीय पेशेवरों और कंपनियों को इससे जुड़ी नीतियों पर ध्यान देना और अपनी रणनीति में बदलाव करना आवश्यक है ताकि वो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रह सकें।
अपने-अपने तर्क
एच-1बी वीजा पर चर्चा अमेरिका में आप्रवास को लेकर बड़ी चिंताओं को दर्शाती है। आलोचकों का तर्क है कि यह कार्यक्रम घरेलू कर्मचारियों के लिए मुश्किलों को बढ़ाने वाला है और विदेशी प्रतिभा पर निर्भरता को बढ़ावा देता है। समर्थकों का कहना है कि यह महत्वपूर्ण श्रम अंतराल को भरता है साथ ही नवाचार को बढ़ावा देता है। अर्थव्यवस्था में इसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है।